कवि अनिल जाॅगडे जी की बढ़ सुग्घर छत्तीसगढ़ी कविता-हमर कतका सुघ्घर खपरा के छानी


हमर कतका सुघ्घर खपरा के छानी



हमर कतका सुघ्घर खपरा के छानी ।
पानी  बरसत  म  चुहे  ओरी ओरी ।।

सोनहा माटी के हमर घर दुवार 
लगे मेयार ऊपर पटिया बोहाये 
तन मेहनत के गिराके पसीना 
सुघ्घर कडेरी म बत्ता ठोकाये 
अरछी परछी संग छाये कुरिया 
छाये खपरा म नई चुहे रे पानी 
हमर कतका सुघ्घर खपरा के छानी ।
पानी  बरसत म  चुहे  ओरी ओरी ।।

खपरा के घर महल के समान 
ठण्डा गर्मी गर्मी म ठण्डा रईथे
बगराथे सुमत के मया पिरीत 
थकहा जागर बड सुख कईथे 
खेती किसानी मोर पावन माटी 
सोनहा धान धराये  बोरी बोरी 
हमर कतका सुघ्घर खपरा के छानी ।
पानी  बरसत म  चुहे  ओरी  ओरी ।।

मोर  गवई  हे  गंगा  पावन 
बड सुघ्घर निर्मल  गांव हे 
खपरा छानी के  घर दुवारी 
जिहा लक्ष्मी जी  के पाव हे 
गुरतुर लागे महतारी के भाखा 
हवय  हमर पुरखा के निशानी 
हमर कतका सुघ्घर खपरा के छानी ।
पानी  बरसत म  चुहे  ओरी  ओरी ।।



 - अनिल जाॅगडे (सरगांव मुंगेली)

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