गाँव बस्ती शहर डहर , आज विरान होगे रे का नई अइस ये कोरोना,जीव के काल होगे रे ।

 🪔जीव के काल होगे रे🪔 

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गाँव  बस्ती  शहर  डहर , आज  विरान होगे  रे 

का नई अइस ये कोरोना,जीव के काल  होगे रे ।


हाँसत कुलकत ये दुनिया म,सुना परगे कोना कोना 

छागे  रे  अमरबेल  असन जी , ये  महमारी  कोरोना

हवा घलो म जहर घोरे,खाँसी सर्दी ह बईमान होगे रे

का  नई अइस  ऐ  कोरोना, जीव  के काल होगे रे। 


मनखे ह मनखे ल डराके, दुरिहा म घुच जावत हें 

छुआ-छूत के महा बिमारी,सबला छूत बनावत हे 

गाँव बस्ती गली खोर ह, आज  सुनशान  होगे रे 

का नई अइस ये कोरोना , जीव के काल होगे रे। 


बिपत ल बाचे  बर  भाई, सुनता ल अपन बनावव 

दूरी बनाके मास्क लगाके, घर परिवार ल बचावव 

काल बनगे आज महर बर,मनखे शर्मसार होगे रे ।

का नई  अइस  ये  कोरोना, जीव  के काल  होगे  रे 


देख रूप बिकराल धरे हे, सब डहर कहर बरसावत हे 

छाती  हरकत  सांस लेवत म, अपन जान गवाँवत हे 

आक्सीजन बर तड़पत हें,अस्पताल शमशान होगे रे 

का नई  अइस  ये  कोरोना, जीव  के काल  होगे  रे ।



रचनाकार- अनिल जांगडे

        सरगांव मुंगेली (छत्तीसगढ़)

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