छतीसगढ़ी कविता-छत्तीसगढ़ के एही माटी म, साहित्यकार अनिल कुमार पाली

 छत्तीसगढ़ के एही माटी म


एही माटी म, लहू वीरनारायण के बगरे हे,
एही माटी म बलिदान हो के, गौरव जेखर चमके हे।

एही माटी म, बाबा गुरुघासीदास के गोठ ह बगरे हे,
एही माटी ह तप के भुइँया बन के, मनखे ल संग म जोरे हे।

एही माटी म बीर गुंडाधुर ह, भूमकाल के जननायक बने हे,
एही माटी ल परदेसिया मन के, आतंक ले आजाद करे हे।

एही माटी म पुरखा खूबचंद के, सुग्घर छत्तीसगढ़ बसे हे,
एही माटी म,छत्तीसगढ़-छत्तीसगढ़िया के सपना सजे हे।

एही माटी म लक्ष्मण मस्तुरिया ह, माटी के मया धरे हे,
एही माटी म "मोर संग चलव" के, सुग्घर गीत ल गढ़े हे।

एही माटी म पुरखा सुंदरलाल ह, पाखंड-कुरीति ले लड़े हे,
एही माटी म छत्तीसगढ़ के, छत्तीसगढ़ी दानलीला रचे हे।

एही माटी म वीरांगना बिलासा ह, साहस के चिन्हा बने हे,
एही माटी म जिनगी देवइया अरपा संग, नवा धार चले हे।

रचनाकार
अनिल कुमार पाली
तारबाहर बिलासपुर

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