कवि-अनिल जाॅगडे जी की लिखी कविता "मजदूर तोर कतका नाव" एक बार जरूर पढ़हु।
प्रवासी श्रमिक पलायन मजदूर
तोर कतका नाव धराये
तैय बेटा माटी के दुलरवा
कभु सुख ल नई पाये
भुख के आंधी गोड़ म छाला
आँखी म आंसू तन के पीरा
दुख दरद के तोर नईये मोल
धरती के तैय हवस ग हीरा
दिन रात तोर करम कमई
रेगत रददा म जान गवाये
तैय बेटा माटी के दुलरवा , कभु सुख ल नई पाये
तन म चिथरा कपड़ा पहिने
भर पेट तैय कभु नई खाये
जुगी झोपडी तोर महल अटारी
सुख के दिन कभु नई पाये
भारत भूईया के श्ररवन बेटा
आज रोजी रोटी तोर छिनाये
तैय बेटा माटी के दुलरवा, कभु सुख ल नई पाये
जांगर टोरत खून पसीना गिराये
मंदिर मस्जिद अऊ महल बनाये
तोर मेहिनत म देश चलत हे
तोर करम म देश बढत हे
करम गाथा तोर गीता कुरान
धरती ल तैय स्वर्ग बनाये
तैय बेटा माटी के दुलरवा, कभु सुख ल नई पाये
एक रोटी पेट के खातिर
तोर होगे कतका आज मजबूरी
दुख के गठरी बोजहा होगे
नई मिलत हे तोला मजदूरी
दुख दरद तोर तन के बेटा
आज कोनो समझ नई पाये
प्रवासी श्रमिक पलायन मजदूर, तोर कतका नाव धराये
तैय बेटा माटी के दुलरवा, कभु सुख ल नई पाये ।।
- अनिल जाॅगडे (सरगांव मुंगेली )





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