युवा कवि साहित्यकार अनिल कुमार पाली जी की कविता मोर नोनी चुंचुनिया भाजी..

 मोर नोनी चुंचुनिया भाजी..



देख तो बइही...मोर नोनी ह..।
कइसे चुंचुनिया भाजी कस चमचमा थे...।
छत्तीसगढ़ के दुलावरिन नोनी ह...।
अपन संस्करीति ल सब्बो डहर बगरात हे...।

चुकचुक ले दिखे मुख ह...।
अउ आंखी ल कइसे मटकात हे..।
लुगरा पहिन हे बढ़ खांटी...।
सुग्घर गेंदा कस महमात हे..।

माथा म चंदा कस बिंदिया बोहे...।
गर म मोती के माला सुहात हे..।
चमचम ले बांधे मुट्ठी ल...।
मोर चुंचुनिया भाजी गुसियत हे..।

लाली-लाली लुगरा संग...।
हरियर चूड़ी म बांह सजात हे..।
दाई के लुकाये लालिमा ले...
अपन होंठ ल चुकचुकात हे...।

कनिहा म धर के हाथ ल...।
बने छत्तीसगढ़ी म गोठियात हे...।
महतारी भाखा के आगी ल...।
मोर दुलावरिन नोनी ह बगरात हे..।

युवा कवि साहित्यकार- अनिल कुमार पाली,
तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़, मो.न. 7722906664

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