होली बर छत्तीसगढ़ी लोकगीत- गीतकार अनिल जांगड़े जी, हमर संस्करीति हमर चिन्हा

 

होली लोकगीत 

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आनी बानी के रंग गुलाल,चारो डहर छागे 

फागुन के फाग खेले रंग बसंती आगे। 


लाली फूले परसा ह ,दुरिहा ल चिनहांत हे

पियर रंग सरसो फूले, देख गेहूं बऊरात हे 

रूख राई डारा पाना-------2

अपन रंग म हरियागे 

फागुन के फाग खेले ,रंग बसंती आगे।


घम-घम ल मौंरे आमा,सेम्हर फूल इतरात हे 

कुहकी मारे कारी कोयली, जीव ल जलात हे 

गुन गुनावत भौंरा देख ------2

मन मोरो बऊरागे

फागुन के फाग खेले, रंग बसंती आगे। 


पड़की परेवना सबो, फागुन गीत गात हें 

सुआ मैना बईठ अमरईया,मन ल मिलात हें 

महुँआ के रस पिये-----2

देख जहुरिया मतागे

फागुन के फाग खेले, रंग बसंती आगे

आनी बानी के रंग गुलाल चारो डहर छागे। 



🖊️अनिल जांगडे सरगांव मुंगेली

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