बांस शिल्प...छत्तीसगढ़ी संस्करीति म
बांस के बने रोज दिन बौउरे वाला समान-
हमर छत्तीसगढ़ के सांस्करीति म वन संपदा के भरमार हे, पूरा छत्तीसगढ़ प्रदेश ह खनिज संपदा ले भरे हवय, छत्तीसगढ़ ल कहे बर तो धान के कटोरा कहिथे फेर धान के संगे-संग इंहा हरियर जंगल, लकड़ी,लोहा भंडार,कोइला भंडार,बिजली उत्पादन, सब्बो के भरमार भरे हे, अइसने भंडार हमर छत्तीसगढ़ के जंगल मन म गांव के मनखे मन के जीविका के उपयोगी समान अब्बड़ अकन मिलथे, जेमा एकठन बढ़ उपयोगी वस्तु हवय जेला हमन बांस कईथन,बांस ह छत्तीसगढ़ के जंगल मन म अब्बड़ अकन देखे बर मिल जही, मनखे मन के जीवन म बढ़ उपयोगी होये के सेती सरकार ह घलोक बांस पेड़ के संरक्षण करत हे, जेखर से सरकारी उपयोग अउ जंगल म रहइंया मनखे मन उपयोग बर बांस ह बांचे रहें, अउ एहि बांस ले बने बांस शिल्प म आज हमन छत्तीसगढ़ के सहरी अउ गंवाई दुनो जगह रोज दिन के उपयोग होवइया समान के गोठ करबो जेन मन ह पूरा तरह से बांस के बने रहिथे अउ बांस के बने समान ल बेच के गंवाई के मनखे मन अपन जीविकोपार्जन करथे।
बांस ले बने हमर उपयोग के समान जेला रोज दिन बउरथन
टुकना- टुकना बनाए बर बांस ल चोट-चोट टुकड़ा म काट के वोला लंबा-लंबा रस्सी असन बना लेथे, जेला बांस के छिले चौड़ा पट्टी बांस म गूथ के बड़का आकार के गोल टुकना बनाथे,बड़े आकार के टुकना ह घर के उपयोग समान मन ल धरे के धान,चाउर धरे के गेंहू,चना धरे के बुता म आथे।
टुकनी- टुकनी ल बांस के लकड़ी ल कंढ़ी असन छोटे छोटे टुकड़ा म छिल के निकाले के बाद टुकनी गुत्थे, टुकनी ह टुकना के छोटे आकार हवय, बड़े रूप म बने ले एहि ल टुकना कहिथन अउ छोटे रूप म बने ले एहि ल टुकनी कहिथन, छोटे आकार के टुकनी के उपयोग सब्जी-भाजी रखें बर काम म आथे, एखर संगे संग नवराति के बेरा म भोजली बोए बर उपयोग म लाथे, टुकनी छोटे असन होये के कारण एमा घर के उपयोग होवइया छोट छोट समान ल रख सकथे।
पररा- बांस के बने पररा छत्तीसगढ़ के घरों-घर म देखे बर मिल जही छत्तीसगढ़हीन दाई मन पररा के सहयोग ले बड़ी सुखाए के बुता म लेथे ऐखरे संगे-संग सब्जी-भाजी रखे बर घलोक ऐखर उपयोग करथे। छत्तीसगढ़ी परिवार के बिहाव म पररा के अब्बड़ बुता रहिथे, बिहाव सुरु होए के संग सब्बो नेग म पररा के काम रहिथे कतको ठन नेग बिना पररा के नइ होवय।
पररी- पररी ल हमन छोटे पररा घलोक कही सकथन, जइसे पररा रहिथे वइसने छोटे रूप म बने बांस के पररी रहिथे, पररी ल माई लोगिन मन भात पसाये बर, कुछु कहीं ल परोसे बर प्लेट जइसे उपयोग करथे, ऐखर संग म छोटे-मोटे बर्तन ल ढाँके बर घलोक पररी के उपयोग करथन, जेन घर म चूल्हा म हड़िया म भात रांधथे उंहा पररी के उपयोग होथे, गंज के, डेचकि म भात पसाय बर पररी ह सहयोग करथे।
झउवा- छत्तीसगढ़ के किसान परिवार म ऐखर अब्बड़ महत्तम रहिथे, जिखर घर म गाय गुरुआ हवय उमन दान, भूसी रखे बर, गोबर कचरा उठाये बर, झउवा के उपयोग होथे।
खरेटा- खरेटा (बहरी)झाड़ू के दूसरा रूप आए, बांस के पतला पतला कांडी ले ऐला बनाथे, गरुवा कोठा ल बहारे बर, माटी वाले जगह ल साफ करें बर, गोबर कचरा ल बहारे बर खरेटा ल काम म लाथन जिखर घर म गरुवा कोठा रहिथे उंखर घर म खरेटा के अब्बड़ काम पड़थे, ऐखर संगे-संग खेती किसानी के बेरा ल घलोक खरेटा काम म आथे।
सुपा- छत्तीसगढ़िया मन के घरों घर आप मन ल सुपा देखे बर मिल जाही, अभी के बेरा म बांस के सुपा के जगह प्लास्टिक के सुपा ह ले लेह हे तभो ल गांव घर म आप मन ल बांस के बने सुपा मिलेच जाहि, घर सुपा बढ़ काम के हवय घर के माई लोगिन मन चाउर-धान पछिने बर(साफ कर बर) सुपा ल काम म लेथे, धान से चांउर से गोटी माटी ल पछिने बर सुपा के बढ़ जरूरत पड़थे।
सुपेली- बांस के बने सुपा के छोटे रूप हवय सुपेली, सुपेली पहली बांस के जादा मिले अभी के बेरा म प्लास्टिक के सुपेली के चलन जादा बाढ़ गे हे, सुपेली म धान, भूसी, कचरा, सब्बो उठाए के बुता म लाथे।
दौरी- दौरी बांस के बने टुकना आए, ऐमा धान चांउर ल रखथे, खाली टुकना म घलोक धान चांउर ल रख सकथे फेर ए मन म धान चांउर ह अब्बड़ अकन फस जाथे जेखर कारण सामान्य टुकना के जगह म दौरी ल रखथे, दौरी ल बनाए बर टुकना ल गोबर अउ माटी के लेप ले पोतथे जेखर ले वो ह अउ मजबूत हो जथे संगे-संग ओखर सब्बो छेदरा मन भर जाथे, ऐला लिपे के बाद सुखाए बर छोड़ देथे, सूखे के बाद ऐमा धान-चांउर ल सहेज के रखे बर नापे बर एक जगह ल दूसर जगह रखे बर बुता म लाथे।
झांपी- झांपी ल बनाए बर बांस के पतला-पतला छिलका निकाल के वोला गुथे जाथे, जेमा छोटे-छोटे छेदा रहिथे जेखर ले हवा ह ओखर भीतरी अउ बाहिर जा सकें, ऐला अउ सुग्घर बनाए बर ऐखर पट्टी मन ल अलग-अलग रंग ले रंग देथे, जेखर से देखे म अब्बड़ सुग्घर दिखथे, झांपी ल मनखे मन मुर्गा-मुर्गी तोपे बर छोटे चिरई चुरगुन ल टोपे बर, बदक ल तोपे बर राखे रहिथे, ऐखर अंदर मुर्गी तीतरी रखथे कई के ऐला जालीदार बनाथे, जेखर से हव अंदर जा सकें अउ अंदर बंद पक्षी मन ल कोनो परेसानी झन होवय।
चोंगरी- बांस के कला कृति म अब्बड़ अकन बांस के छोटे बड़े टुकड़ा ह बच जाथे, जेन टुकड़ा ल उपयोग म लाए बर पतला पतला चील के मछरी पकड़े के चोंगरी बनाए के बुता म लाथे, चोंगरी ल घना बांस के टुकड़ा के संग गुथे जाथे, ऐला गुथत बेरा धियान दे जाथे की कोनो मेर बड़का छेदा झन छुटे रहे, सब्बो बांस ह एक दूसर ल चमचम ल बंधाये रहिथे, जजेखर से नदी तलाव म मछरी पकड़े म आसानी होथे।
छितका- छितका ह देखे म कमंडल असन दिखते ऐला कोनो मेर भी टांग के रख सकथन, छितका ल घलोक बनाए बर बस के पतला पतला कांडी के उपयोग करथे, गाँव घर म छितका म घी रखे बर अउ कोनो अइसने समान जेला बिलाई ह झन अमर सकें तइसने रखें बर कोनो जगह म टांग के रखथे।
खुमरी- छत्तीसगढ़ी संस्करीति म खुमरी सब्बो डहर देखे बर मिल जही, सरल भाखा म खुमरी ह छत्तीसगढ़ी टोपी कही सकथन, पहली के बेरा म मुड़ी म पहिने बर किसान मनखे मन खुमारी ल रखें, अभी घलोक गाय गरुवा चरईया मनखे मन, खेती किसानी करईया मनखे मन खुमरी लगाए मिल जही, खुमरी लगाए ले पानी बरसात धूप सब्बो ले बचाथे। यादव समाज के मनखे मन ऐला अपन मेर जादा रखथे, गरुवा चराए के बेरा म खुमरी ल मुड़ी म तोप के निकलथे, खुमरी ल बनाए बर अब्बड़ महेनत लगथे, एही बढ़ डिजाइन दार रहिथे, जेला रंग म रंगे के बाद अउ सुग्घर लगथे।
युवा कवि साहित्यकार
अनिल कुमार पाली
तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़
मो.न:- 7722906664
बांस ले बने हमर उपयोग के समान जेला रोज दिन बउरथन
टुकना- टुकना बनाए बर बांस ल चोट-चोट टुकड़ा म काट के वोला लंबा-लंबा रस्सी असन बना लेथे, जेला बांस के छिले चौड़ा पट्टी बांस म गूथ के बड़का आकार के गोल टुकना बनाथे,बड़े आकार के टुकना ह घर के उपयोग समान मन ल धरे के धान,चाउर धरे के गेंहू,चना धरे के बुता म आथे।
टुकनी- टुकनी ल बांस के लकड़ी ल कंढ़ी असन छोटे छोटे टुकड़ा म छिल के निकाले के बाद टुकनी गुत्थे, टुकनी ह टुकना के छोटे आकार हवय, बड़े रूप म बने ले एहि ल टुकना कहिथन अउ छोटे रूप म बने ले एहि ल टुकनी कहिथन, छोटे आकार के टुकनी के उपयोग सब्जी-भाजी रखें बर काम म आथे, एखर संगे संग नवराति के बेरा म भोजली बोए बर उपयोग म लाथे, टुकनी छोटे असन होये के कारण एमा घर के उपयोग होवइया छोट छोट समान ल रख सकथे।
पररा- बांस के बने पररा छत्तीसगढ़ के घरों-घर म देखे बर मिल जही छत्तीसगढ़हीन दाई मन पररा के सहयोग ले बड़ी सुखाए के बुता म लेथे ऐखरे संगे-संग सब्जी-भाजी रखे बर घलोक ऐखर उपयोग करथे। छत्तीसगढ़ी परिवार के बिहाव म पररा के अब्बड़ बुता रहिथे, बिहाव सुरु होए के संग सब्बो नेग म पररा के काम रहिथे कतको ठन नेग बिना पररा के नइ होवय।
पररी- पररी ल हमन छोटे पररा घलोक कही सकथन, जइसे पररा रहिथे वइसने छोटे रूप म बने बांस के पररी रहिथे, पररी ल माई लोगिन मन भात पसाये बर, कुछु कहीं ल परोसे बर प्लेट जइसे उपयोग करथे, ऐखर संग म छोटे-मोटे बर्तन ल ढाँके बर घलोक पररी के उपयोग करथन, जेन घर म चूल्हा म हड़िया म भात रांधथे उंहा पररी के उपयोग होथे, गंज के, डेचकि म भात पसाय बर पररी ह सहयोग करथे।
झउवा- छत्तीसगढ़ के किसान परिवार म ऐखर अब्बड़ महत्तम रहिथे, जिखर घर म गाय गुरुआ हवय उमन दान, भूसी रखे बर, गोबर कचरा उठाये बर, झउवा के उपयोग होथे।
खरेटा- खरेटा (बहरी)झाड़ू के दूसरा रूप आए, बांस के पतला पतला कांडी ले ऐला बनाथे, गरुवा कोठा ल बहारे बर, माटी वाले जगह ल साफ करें बर, गोबर कचरा ल बहारे बर खरेटा ल काम म लाथन जिखर घर म गरुवा कोठा रहिथे उंखर घर म खरेटा के अब्बड़ काम पड़थे, ऐखर संगे-संग खेती किसानी के बेरा ल घलोक खरेटा काम म आथे।
सुपा- छत्तीसगढ़िया मन के घरों घर आप मन ल सुपा देखे बर मिल जाही, अभी के बेरा म बांस के सुपा के जगह प्लास्टिक के सुपा ह ले लेह हे तभो ल गांव घर म आप मन ल बांस के बने सुपा मिलेच जाहि, घर सुपा बढ़ काम के हवय घर के माई लोगिन मन चाउर-धान पछिने बर(साफ कर बर) सुपा ल काम म लेथे, धान से चांउर से गोटी माटी ल पछिने बर सुपा के बढ़ जरूरत पड़थे।
सुपेली- बांस के बने सुपा के छोटे रूप हवय सुपेली, सुपेली पहली बांस के जादा मिले अभी के बेरा म प्लास्टिक के सुपेली के चलन जादा बाढ़ गे हे, सुपेली म धान, भूसी, कचरा, सब्बो उठाए के बुता म लाथे।
दौरी- दौरी बांस के बने टुकना आए, ऐमा धान चांउर ल रखथे, खाली टुकना म घलोक धान चांउर ल रख सकथे फेर ए मन म धान चांउर ह अब्बड़ अकन फस जाथे जेखर कारण सामान्य टुकना के जगह म दौरी ल रखथे, दौरी ल बनाए बर टुकना ल गोबर अउ माटी के लेप ले पोतथे जेखर ले वो ह अउ मजबूत हो जथे संगे-संग ओखर सब्बो छेदरा मन भर जाथे, ऐला लिपे के बाद सुखाए बर छोड़ देथे, सूखे के बाद ऐमा धान-चांउर ल सहेज के रखे बर नापे बर एक जगह ल दूसर जगह रखे बर बुता म लाथे।
झांपी- झांपी ल बनाए बर बांस के पतला-पतला छिलका निकाल के वोला गुथे जाथे, जेमा छोटे-छोटे छेदा रहिथे जेखर ले हवा ह ओखर भीतरी अउ बाहिर जा सकें, ऐला अउ सुग्घर बनाए बर ऐखर पट्टी मन ल अलग-अलग रंग ले रंग देथे, जेखर से देखे म अब्बड़ सुग्घर दिखथे, झांपी ल मनखे मन मुर्गा-मुर्गी तोपे बर छोटे चिरई चुरगुन ल टोपे बर, बदक ल तोपे बर राखे रहिथे, ऐखर अंदर मुर्गी तीतरी रखथे कई के ऐला जालीदार बनाथे, जेखर से हव अंदर जा सकें अउ अंदर बंद पक्षी मन ल कोनो परेसानी झन होवय।
चोंगरी- बांस के कला कृति म अब्बड़ अकन बांस के छोटे बड़े टुकड़ा ह बच जाथे, जेन टुकड़ा ल उपयोग म लाए बर पतला पतला चील के मछरी पकड़े के चोंगरी बनाए के बुता म लाथे, चोंगरी ल घना बांस के टुकड़ा के संग गुथे जाथे, ऐला गुथत बेरा धियान दे जाथे की कोनो मेर बड़का छेदा झन छुटे रहे, सब्बो बांस ह एक दूसर ल चमचम ल बंधाये रहिथे, जजेखर से नदी तलाव म मछरी पकड़े म आसानी होथे।
छितका- छितका ह देखे म कमंडल असन दिखते ऐला कोनो मेर भी टांग के रख सकथन, छितका ल घलोक बनाए बर बस के पतला पतला कांडी के उपयोग करथे, गाँव घर म छितका म घी रखे बर अउ कोनो अइसने समान जेला बिलाई ह झन अमर सकें तइसने रखें बर कोनो जगह म टांग के रखथे।
खुमरी- छत्तीसगढ़ी संस्करीति म खुमरी सब्बो डहर देखे बर मिल जही, सरल भाखा म खुमरी ह छत्तीसगढ़ी टोपी कही सकथन, पहली के बेरा म मुड़ी म पहिने बर किसान मनखे मन खुमारी ल रखें, अभी घलोक गाय गरुवा चरईया मनखे मन, खेती किसानी करईया मनखे मन खुमरी लगाए मिल जही, खुमरी लगाए ले पानी बरसात धूप सब्बो ले बचाथे। यादव समाज के मनखे मन ऐला अपन मेर जादा रखथे, गरुवा चराए के बेरा म खुमरी ल मुड़ी म तोप के निकलथे, खुमरी ल बनाए बर अब्बड़ महेनत लगथे, एही बढ़ डिजाइन दार रहिथे, जेला रंग म रंगे के बाद अउ सुग्घर लगथे।
युवा कवि साहित्यकार
अनिल कुमार पाली
तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़
मो.न:- 7722906664





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