माटी कोखरो जात नइ पूछे, सब ल एही माटी म मिलाथे। कवि अनिल कुमार पाली

 

लईका के हत्या

माटी कोखरो जात नइ पूछे,

सब ल एही माटी म मिलाथे।

महतारी पोटारे छाती ले जइसे,
तइसन अपन कोरा म मनखे ल सुताथे।

एही माटी के बने घर-कुरिया मरकी-घड़ा,
सब्बो मनखे के प्यास बुझाथे।

लईका होए के सियान बिन जाति पूछे,
सब ल अपन कोरा म बराबर लुकाथे।

ए माटी के बने मनखे के काठी फेर
काबर छोटे-बड़े जाति दूसर ल बताथे।

प्यास लगीस त पानी पीये के सजा
अपन जिनगी ल दे के लईका चुकाए।

ए माटी के बने मनखे तय काबर
ऊंच-निच के जात बनाए।

युवा कवि साहित्यकार
अनिल कुमार पाली
तारबाहर बिलासपुर

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