युवा कवि साहित्यकार अनिल कुमार पाली जी की कविता- ये भाखा के लड़ाई हे, एक बार जरूर पढहु

                 ये भाखा के लड़ाई हे


जाने बर लगही अउ जनाये बर लगही,
अपन पढ़े बर लगही, अउ पढ़ाय बर लगही,
जगह-जगह येखर गुन ल, बगराये ल लगही,
ये भाखा के लड़ाई हे बाबू ,येला अइसने नई जीते जाए।
अपन भाखा ल जगाये बर, करेजा म आगी लागये ल पढ़ही ।

सियान मन के गोठ ल, अपनाये ल लगही,
पागा म कलगी असन, विचार ल खोचाये ल लगही,
सब्बो छत्तीसगढ़िया के, अस्मिता ल जगाये ल लगही,
मरे मनखे ल संजीवनी दे के जियाय ल लगही।
ये भाखा के लड़ाई हे बाबू, मुड़ी घलोक पूजवाये ल लगही।

भुलाये मनखे ल, भाखा के सुरता देवये ल लगही,
सुग्घर रददा म रेंग के, सड़क नपवाये ल लगही।
आनी-बानी के भाखा ल, तिरियाय ल लगही।
ये अपन अधिकार के लडाई हे बाबू, लहू घलोक बोहाये ल लगही।

महतारी भाखा सब्बो झन ल गोठियाय ल लगही।
गुलामी के बोहे बोझा ल, पटकवाये ल लगही।
भाखा के होवत विनास ल, सुधरवाये ल लगही।
अपन बोली भाखा ल सब्बो कोती बगराये ल लगही।
ये भाखा के लड़ाई हे बाबू, जियत भर लड़े ल लगही।

दाई के दूध के करजा ल, तोही ल चुकाये ल लगही।
महतारी के होवत पीरा, लईका ल जनाये ल लगही।
ये छत्तीसगढ़िया के लड़ाई में हे, अपन भाखा ल बगराये ल लगही।


युवा कवि साहित्यकार, महतारी के मयारू
अनिल कुमार पाली, तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़
मो.न 7722906664

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