कविता-मोर महतारी के भाखा, कवि- अनिल जाॅगडे (सरगाव मुंगेली)


       मोर महतारी के भाखा 


छत्तीसगढ़ महतारी के बोली 

जनम  जनम के हे नाता 

बड  गुरतुर लागे रे भईया 

मोर  महतारी के भाखा ।।


मोर महतारी छत्तीसगढ़ के 

बोली  ह  गुरतुर  लागे 

भाखा हमर दया मया के 

सुमत के  पिरीत जागे 

गांव गवई अऊ खोर गली 

बोली भाखा संग हे नाता 

बड गुरतुर लागे रे भईया 

मोर  महतारी  के भाखा ।।


गांव गवई म सुघ्घर लागे 

मोर  महतारी के बोली 

बोलत भाखा गुरतुर लागे 

मन भाये हंसी ठिठोली 

रुख राई  जंगल झाड़ी 

खेती खार संग हे नाता 

बड गुरतुर लागे रे भईया 

मोर  महतारी के भाखा ।।


दया मया के अईसन भाखा 

सुने म लागे मन भावन 

महतारी के भाखा अईसन 

जईसे गंगा कस हे पावन

छत्तीसगढ़ महतारी के बोली 

जनम जनम के हे नाता

बड गुरतुर लागे रे भईया

मोर  महतारी के भाखा ।।


अईसन भाखा महतारी के 

तन अंतस म पोह जाथे 

बोली बतरस के  चिनहारी 

मोती  असन बग  राथे

कोयली कस गुरतुर बोली

मैना  कस  मिठ भाखा 

बड गुरतुर लागे रे भईया

मोर  महतारी के भाखा ।।


दाई के भाखा फूल मोगरा 

बोलत मन खिल जाथे 

अईसन हे महतारी भाखा 

सुनत जीव तर जाथे 

सुआ ददरिया करमा पंथी 

गीत  संगीत नाचा बाजा 

बड गुरतुर लागे रे भईया

मोर  महतारी के भाखा ।।


✒️- अनिल जाॅगडे (सरगाव मुंगेली)

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