छत्तीसगढ़ी के बढ़ सुग्घर कविता-तोर सुरता कवि- अनिल कुमार पाली, बिलासपुर

 

❤ तोर सुरता ❤


चंदा ल कहे रहेंव, तोर सुरता झन देवाबे।
फेर चमक के तोर सुरता ल देवा दिस।।
अइसे बरसिस ये बैरी बादर ह के।
फेर मोर मया ल भीगा दिस।।

कतका पथरा लदक के करेजा म।
तोर सुरतिया ल भुलाये रहेंव।।
फेर काबर रेंगेव मैं ये रददा म।
के फेर तोर सुरता ल देवा दिस।।

कइसे बताओ कतका घव किंजरे हव मय।
तोर दुवंरि ले अपन आँखी ल मुंद के।।
फेर तोर पायल के छनक ह,
मोर जीवरा ल मता दिस।।


✍️ युवा कवि साहित्यकार
अनिल कुमार पाली, तारबाहर बिलासपुर




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1 Comments

  1. पहली नजर म पढेंव त मोर हाथ ह कमेंट करे बर अगवा दिस👌👌👌

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