साहित्यकार अमित कुमार जी द्वार छत्तीसगढ़ी परम्पराओं पर विशेष लेख- आगे तिहार सुरूति

 आगे तिहार सुरूति


        कातिक अमावस आये हे, मनखे मन खुसी मनाये हे।

गांव गली दिखे सुघ्घर, अउ घर अंगना ह लिपाये हे।।

करेन अगोरा अब्बड़ हमन, आये हावय सालभर म।

दियना जलत हे जगमग, खोर गली अउ घर म।।

उजियारा होय सबो के जिनगी, खुसी म दिया जलाबो।

आगे तिहार सुरूति, गौरा बिहाव रचाबो।।


होहि बिहाव गउरा चावरा म, मड़वा सजे हे सुघ्घर।

धान के बाली संग दियना, करसा सजाबो दिनभर।।

मिल-जुल जम्मो बिहाव रचाबो, सुघ्घर खुसी मनाके।

मन के मनौती संग आसीस पाबो, सरन म सेवा बजाके।।

चार पहर बर आये रहिथे, चरन म माथ नवाबो।

आगे तिहार सुरूति, गौरा बिहाव रचाबो।।


साहित्यकार अमित कुमार

गाड़ाघाट-पाण्डुका, गरियाबंद

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