सब जगह बना श्मशान कवि अनिल जाँगडे जी की कविता

 सब जगह बना श्मशान 

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मातम छाया चारों ओर है,सब जगह बना श्मशान 

देख अपने कर्म जाल में, आज फँस  गया  इंसान ।


पेड़-पौधे सब जंगल काटे,आज रो रही है ये धरती 

निर्मल गंगा पावन नदियां,सिसक-सिसक कर बहती

अपने लिए गड्ढे खोदकर, ले रहा अपनों की जान 

देख अपने कर्म जाल में ,आज  फँस  गया इंसान। 


अपनी तरक्की की चाह में,प्रकृति को बड़ सताता है 

जल जंगल और जमीं को ,बनकर  दानव  खाता है 

हर जगह प्रदूषित करता,बनकर राक्षस और शैतान

देख अपने कर्म जाल में ,आज फँस गया इंसान। 


अपने स्वार्थ अभिमान में,सब ऊँचे भवन बनाते हैं 

महकी मिट्टी इस धरती की,देख पत्थर से पटवातें हैं

कैसे बदल रहा है जीवन ,मानव हो गया रे  हैरान 

देख अपने कर्म जाल में ,आज फँस  गया  इंसान । 


चाँद पर चढ़ने वाले मानव,आज धरा पर गिर गया 

देख तांडव महामारी की, मानव सब सिहर गया 

लाशें बोल रही हैं उठकर ,आज करो मेरा सम्मान 

देख अपने कर्म जाल में ,आज फँस  गया  इंसान। 




🖊️ अनिल जाँगडे 

     सरगांव मुंगेली छत्तीसगढ़

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