कविता-इही हमर जिनगानी हे कवि-अनिल जाँगडे सरगांव मुंगेली छत्तीसगढ़

 

इही हमर जिनगानी हे 

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जल जंगल अऊ जमीन हमर 

पुरखा के निशानी हे 

जुरमिल के प्रकृति बचावव

इही हमर जिनगानी हे।


झन काटव रूख राई ल

धरती दाई के सिंगार हे

पहाड़ पर्वत जंगल झाड़ी  

सुघ्घर पुरवईया बहार हे 

रखना हवय बचाके हमला 

हमर जीव बर बड़दानी हे   

जुरमिल के प्रकृति बचावव 

इही हमर जिनगानी हे। 


झन बनावव धरती ल बंज़र 

माटी ल सुग्घर सजावव

जगह-जगह म पेड़ लगाके 

प्रकृति ल अपन बचावव

जियत ले आक्सीजन मिलही

नही त बड़ परशानी हे 

जुरमिल के प्रकृति बचावव 

इही हमर जिनगानी हे। 


मनखे देखलव हाल अपन

हवा बीना मर जावत हें 

पर्यावरण ह प्रदूषीत होगे 

मनखे ल सऊघे खावत हे 

जल जंगल अऊ जमीन के 

अमर  कथा  कहानी हे  

जुरमिल के प्रकृति बचावव 

इही हमर जिनगानी हे। 



 🖊️अनिल जाँगडे 

      सरगांव मुंगेली छत्तीसगढ़

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