धनहा सबो हरियागे रे-छत्तीसगढ़ी कविता, कवि अनिल जांगड़े जी

 🌾धनहा सबो हरियागे रे🌾

             

गूगल ले प्राप्त

गरज गरज के बरसे पानी 

भूइंया के प्यास बुझागे रे 

सुख्खा परे सब खेतखार ह

धनहा  सबो  हरियागे  रे। 


पिंयर पिंयर दिखे धान ह

भूइया सबो हरियागे 

पुर्वइया संग झूमय नाचय 

रूख राई मन मतागे 

नदिया नरवा बोहावत हवय

तरिया घलो अघागे रे 

सुख्खा परे सब खेतखार ह

धनहा सबो हरियागे रे। 


नाँगर जोतत जाँगर टोरे 

दुख पीरा बिसरागे 

किसान के मन कुलकत हे

मन म खुशी समागे 

कोला बारी कोठी डोली 

दुख के दिन भगागे  रे 

सुख्खा परे सब खेतखार ह 

धनहा सबो हरियागे रे। 


छंईया भूइया धान कटोरा 

सुख के दिन फेर आगे 

सुआ ददरिया कर्मा के धून 

गली  गली  म  छागे

छत्तीसगढ महतारी के कोरा

भूइया सबो ममहागे रे 

सुख्खा परे सब खेतखार ह 

धनहा सबो हरियागे रे। ‌‌‍ 



🖊️अनिल जांगडे 

    सरगांव मुंगेली ।

Post a Comment

0 Comments