हमर भासा
दूसर राज के भासा ल जबरन जोर के अपन मुड़ी ल फोहड़बे।
संस्करीति नइ बांचही त काला धरबे, छत्तीसगढ़ ल कइसे तरबे।
जाने त जग जानी, नइ कुछु त मुड़भसरा बानी।
अपन भासा बनगे तभो ले, पाछु जुड़ा गे दूसर के भासा बानी।
काखर-काखर ल धर लेबे, अपन भासा ल कब तरबे।
दूसरे के बानी मीठ मदिरा कस, अउ अपन भासा बन गे पानी।
गोठिया-गोठिया कही के मर के बड़े-बड़े ग्यानी।
जग म नइ जग सके रे छत्तीसगढ़िया मनखे तोर बानी।
जेला पाबे तेला खिसियाबे भासा गोठियाये बर मनाबे।
फेर झन भुलाबे अपन लईका ल महतारी भासा कब जनाबे।
आप गोठ ल गोठियाबे तभे तो सुग्घर चिन्हाबे।
कोड़ो-बोडो करबे ता छत्तीसगढ़ म कइसे गरब कर पाबे।
छत्तीसगढ़ के बानी भुलात जाथे दाई लईका सियानी।
कहत कहत मार गे रे छत्तीसगढ़ के पूरा बड़े ग्यानी।
छत्तीसगढ़ी भासा ल गोठियाबे त महतारी के मया ल पाबे।
संग म अपन राज के भासा ल सबो कोती बगराबे।
युवा कवि साहित्यकार
अनिल कुमार पाली
तारबाहर बिलासपुर




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