लोकगीत- तोर मया संग मोर मया के, कवि अनिल जांगड़े

 लोकगीत

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तोर मया संग मोर मया के,गांठ परे हे बढ़िया

तहूं छत्तीसगढ़ीया हस ओ,महूं छत्तीसगढ़ीया ।


मया पिरीत के बंधना बांधे, तॅंय हर ओ मन भरके

अड़बड़ तोर सुरता सताथे, मोला ओ रही रही के

मीठ मया के जाल म दोनो------

                      फंसे हवन रे बढ़िया

तोर मया संग मोर मया के, गांठ परे हे बढ़िया।

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मॅंय गॅंवइहा छत्तीसगढ़ीया,तॅंय शहर के छोरी

मॅंय हवव ओ निचट करिया,तॅंय हवस ओ गोरी

मॅंय गरीब नगरिहा के बेटा-----

                      तॅंय बड़े घर के रहइया

तोर मया संग मोर मया के, गांठ परे हे बढ़िया ।

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जियत ले संग छुटय झन,चल खाबो रे किरिया

सुख दुख ल सहिके रहिबोन,नई होवन रे दुरिया

तॅंय बनबे मोर बासी लेगइया-----

                     मॅंय बनहॅंव तोर नगरिया

तोर मया संग मोर मया के,गांठ परे हे बढ़िया ।

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रूपिया किलो चंऊर पाबोन,ख़ाके दोनो कमाबो

आवास योजना पाबोन ओ,मया के कुरिया बनाबो

हॅंसी खुशी म जीनगी पहाबो----

                   संग रहिबो दोनो बढ़िया

तोर मया संग मोर मया के,गांठ परे हे बढ़िया

तहूं छत्तीसगढ़ीया हस ओ, महूं छत्तीसगढ़ीया ।।




✍️ अनिल जांगड़े

      सरगांव मुंगेली

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