कवि अनिल जांगडे जी सरगांव मुंगेली वाले के बढ़ सुग्घर कविता -तहिं मुक्ति के धाम, एक बार जरूर पढ़हु मन प्रसन्न हो जही।

 तहिं मुक्ति के धाम

  

मरघट मर घटीया शमसान ,तोर कतका सुघ्घर नाम

तोर अंगना म सबो बरोबर ,तहिं  मुक्ति के  धाम ।


तोर  शरन  म  सबो  आथें, राजा  रंग  फकीर 

नई ये दुआ भेदी तोरजग,सब बर ऐके लकीर 

तोर कोरा म नई लागय ,भूख प्यास अऊ घाम 

तोर अंगना म सबो बरोबर, तहिं मुक्ति के धाम ।


तोर गोदी म जेहर आथे ,छोड़ दुनिया ल जुच्छा 

धन दौलत महल अटारी, सोना चाँदी के गुच्छा 

जग दुनिया ल पाथें मुक्ति,नई लेवस कुछु दाम 

तोर अंगना म सबो बरोबर,तहिं मुक्ति के धाम। 


नई चिनहत अमीर गरीब ल,जात पात धरम ल

तोर चरन म आथें सबो ,नई पूछत तैंय करम ल

सबो ल एक दिन जाना हे ,अमर हवय तोर नाम

तोर अंगना म सबो बरोबर, तहिं मुक्ति के धाम।


खाली हाथ आये जग म, खाली  हाथ तैय जाबे 

जईसन जईसन करम करबे,वईसन फल ल पाबे 

चार कांधा चारपाई म आथें,कोन बिहनिया साम 

तोर अंगना म  सबो बरोबर, तहिं  मुक्ति के धाम।


कवि

🖊️ अनिल जांगडे सरगांव मुंगेली

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