दया मया सुनता के- देवारी तिहार -कवि अनिल जांगड़े

 दया मया सुनता के

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दया मया सुनता के भइया

घर-घर दीया जलावव

अंधियारी बर पुन्नी के चंदा

बनके अंजोर बगरावव।

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सोनहा माटी माटी के दीया

माटी म घर ल सजावव

सुनता पिरीत धरम के दीया

जुरमिल सबो जलावव

हंसी खुशी म ज़िनगी पहावव

कोनो ल झन सतावव

दया मया सुनता के भइया 

घर-घर दीया जलावव।

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तन के दीया म मया के बाती,

जग जग ल करव अंजोर

सुख के सुघ्घर गठरी जोरव

कहना ल मानव  मोर

सुमता सुरूज के दीया बारव

भाग ल अपन जगावव

दया मया सुनता के भइया

घर-घर दीया जलावव।

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देख देवारी म धान के बाली

धरती म सोन बगराये हे

होता बिहनीया चारो मुड़ा म

बनके मोती चमकाये  हे

चॅंदा चॅंदैनी कस मुस्कावव

हॅंसव  सबला हॅंसावव

दया मया सुनता के भइया

घर-घर दीया जलावव।

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गिरे  परे  हट्टे  मनके  बर

रददा ल सुघ्घर बनावव

दीन-दुखिया के बनके साथी

संग म अपन  रेंगावव

दाई ददा के सेवा ल करके

जियत पुण्य कमावव

दया मया सुनता के भइया

घर-घर दीया जलावव ।

दीपावली की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

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✍️ अनिल जांगड़े

    सरगांव मुंगेली

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