हिंदी भाषा की मजबूत स्थिति हिंदी दिवस विशेष लेख आमंत्रित- श्री अमित कुमार आरुग न्यूज- भाषा, अपनी बात लोगों तक प्रेषित करने तथा लोगों की बातों को समझने का सुगम माध्यम है। वैश्विक स्तर के साथ ही भारत में भी भाषाओं का विशेष महत्व है। भारत मे सैकडों भाषाएँ तथा हजारों बोलियां प्रचलित हैं। किन्तु वैधानिक रूप से कुछ ही भाषाएँ स्वीकार की गई हैं। जिनमे हिंदी भाषा का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। हिंदी भाषा के प्रादुर्भाव से विकास तक की कड़ी में इसके प्रचार, प्रकृति तथा लोकप्रियता में काफी परिवर्तन हुए हैं। हिंदी केवल भाषा ही नहीं, एक जीवनशैली भी है। जो दैनिक …
हिंदी मेरी भाषा मीठी मेरी हिंदी भाषा, जन-जन के मन को भाती। उत्तर से दक्षिण तक, सभी संस्कृति में समा जाती। गौरव गाकर वीरों का, सुंदर सा राग सुनाती। भारत मां के सपूतों को, गर्व की अनुभूति कराती। मीठी मेरी हिंदी भाषा.......। हर कवियों के पन्नों पर, प्यार भरा रंग छोड़ जाती। मधुर-मिठास बोली में, सब जगह छा जाती है। सूर संगीत और संस्कृति में, अपना हर बात मनवाती। सुंदर मधुर गीतों में, सबके मन को है भाती। मीठी मेरी हिंदी भाषा..........। प्रारंभ से अंत तक, भारत के गुणगान गाती। देशों और विदेशों में अपना एक, अलग ही पहचान बनाती।। मीठी मेरी हिंदी…
समाचार पत्र-अखबार-न्यूज पेपर मैं अख़बार हु जनाब सच को पन्नो में उकेरता हु, रात भर जाग कर..खुद को सहेजता हु। झूट को झूट सच को अच्छा कहता हूं, मैं अखबार हु जनाब..हर रोज बदलता रहता हूं।। ज्ञान भर के दुनिया का अपने समंदर में, सभी ज्ञानियों को रोज डुबोता हु। चाय की चुस्कियों के संग सब की पसंद का, हर सुबह पूरा ख्याल रखता हूं।। जब तक इस दुनिया मे जीता हु, लोगों को ज्ञान बांटते रहता हूं। कचरा हो या कमल का फूल, सभी रिश्तों से हमेशा जूझता रहता हूं। मैं अखबार हु जनाब.. हर रोज बदलता रहता हूं कभी गरीबों के बिस्तर…
मजदूर दिवस मैं मजदूर हूँ पसीने का नमक बना कर, किस्मत चमकाता हूँ।। हाथों की लकीरों को रोज मैं मिटाता हूँ।। हर निर्माण में जी-जान अपनी लगता हूँ।। मिट्टी से महल मैं ही बनाता हूँ।। मिट्टी को मल कर आकार मैं बनाता हूँ।। सभी वस्तुओं को उपयोगी मैं ही बनाता हूँ।। मैं मजदूर हु, पसीना रोज बहाता हु। लंबी-लंबी दूरियों में पैदल ही चला जाता हूं।। समाज का सारा बोझ अपने कंधे में उठाता हूँ।। मेहनत ईमानदारी के पैसे से सुखी रोटी खाता हूं।। अपनी कुटिया को अपना महल मैं बताता हूँ।। मैं म…
गुलाम अनियमित कर्मचारी. . तोड़ गुलामी की जंजीरे, नियमितीकरण का आगाज कर।। कब तक सहन करेगा जुल्मों को, सीने में अब अपने तू आग लगा। सोने का वक्त बीत गया, खुद को अब नींद से जगा।। दामन थाम ले प्रा. कर्मचारी संघ का।। नियमितीकरण में अपना दाव लगा। वक्त बीत गया है बहुत, इन जुल्मों को न अब सहता जा, अपनी लड़ाई खुद लड़ कर जीत, फिर एक नया इतिहास बना।। अनियमित की इन जंजीरों को तोड़ कर, गुलामी से खुद को आजाद करा।। नियमित हो के इस दुनिया को, प्रगतिशील संघ का दम दिखा। हाथ मे हाथ धरा न बैठ, लड़ाई को अब अपनी आघे बढ़ा। डर का चादर छोड़ के, हि…
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